Sangeet Suryodaya ka Nrttadhyay Ek Anushilan
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-नृत्य को विशेषतः दृश्य-माध्यम माना जाता है, जिसमें प्रयोग प्रधान है, किन्तु इसके लिए भी शास्त्र-विधान आवश्यक है। शास्त्र के आधार पर ही कला को शास्त्रीय की संज्ञा दी जा सकती है। इसके माध्यम से ही हम नियम, विधि आदि का आकलन कर सकते हैं। जितनी प्राचीन हमारी नृत्य परंपरायें हैं उतनी ही प्राचीन इसके शास्त्रीय ग्रन्थों की परंपरा है। संगीत-सूर्योदय के रचयिता महान मनीषी आचार्य लक्ष्मीनारायण प्रख्यात कलानुरागी थे, जो कि विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के राजकवि थे। किन्तु संगीत जगत संगीत-सूर्योदय की ज्ञान संपत्ति से अद्यपर्यन्त परिचित और लाभान्वित नहीं हो पाया है। संगीत-सूर्योदय के नृत्याध्याय में नृत्य की उत्पत्ति अभिनय भेद निरूपण में अंग प्रत्यंगोपांग विवरण, करण, अंगहार, चारी, स्थानक लास्यांग, पात्रलक्षण, गुण-दोष, शुद्धिपद्धति, वृत्ति निरूपण, कुतपलक्षण आदि नृत्य विषयों का लक्षणबद्ध विवेचन संप्राप्त है। तुलनात्मक अध्ययन हेतु नाट्यशास्त्र संगीत रत्नाकर एवं अभिनयदर्पण ग्रन्थों का उपयोग प्रमुखतः किया गया है। ऐसे अनेक ग्रन्थ एवं नाट्याचार्यों का उल्लेख इतिहास में मिलता है, जिनका नृत्य के विकास में महत्वपूर्ण रहा है। वे परंपरा के संग्राहक रहे हैं। अनेक नाट्याचार्यों की रचनाएं देखरेख के अभाव में नष्ट हो गई या उनकी प्राप्त पांडुलिपियों में क्रमबद्धता दृष्टव्य नहीं है। संगीत-सूर्योदय के अनुशीलन का उद्देश्य भी यही है कि अतीत में खोये नाट्याचार्यों की चिंतन परंपरा को समझा जा सके।
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